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Daastaane begunaahi

Daastaane begunaahi

दास्तां बेगुनाह आतंकियों की

1996 के समलेती ब्लास्ट केस में अली भट्ट समेत 4 लोगों को राजस्थान हाइकोर्ट ने आतं’कवाद के केस से 2019 में 23 साल जेल बाद बाइज्जत बरी किया,लतीफ अहमद बाजा (42), अली भट्ट (48), मिर्जा निसार (39), अब्दुल गोनी (57) और रईस बेग(56) को 1996 में जेल भेजा गया था।

11 लोगों को बाबरी मस्जिद गिराए जाने का बदला लेने की साज़िश रचने और आतं’की प्रशिक्षण हासिल करने के लिए वर्ष 1994 में टाडा कानून के तहत गिरफ़्तार किया गया था.जिन्हें नासिक की टाडा अदालत ने आतं’कवाद से जुड़े मामले में 25 साल बाद 27 फरवरी 2019 को सबूत ना होने के कारण बरी किया।

जलीस अंसारी को 1993 में देश के अलग अलग हिस्सों में बम ब्लास्ट करने के आरोप में गिरफ्तार किया,सुप्रीम कोर्ट ने उन्हें हैदराबाद बम ब्लास्ट मामले में 2016 में 23 साल बाद बरी किया लेकिन जलीस आज भी जेल में है क्योंकि अदालत ने उन्हें अन्य ब्लास्ट मामले में उम्र क़ैद की सजा सुनाई।

दिल्ली-गाजियाबाद बम ब्लास्ट मामले में 18 वर्ष की उम्र में मौ० आमिर खान को 1996 में गिरफ्तार किया गया और 2010 में 14 साल बाद कोर्ट ने बरी कर दिया,जब तक आमिर बरी हुआ देश डिजिटल बन चुका है और वह मोबाइल फोन को देख चोंक गया था क्योंकि आमिर को नही पता था कि मोबाइल कैसा होता है।

बिजनौर के 32 वर्षीय नासिर हुसैन को 22 धमाकों का मास्टरमाइंड बताया गया लेकिन 14 साल के बाद वह निर्दोष साबित हुआ, नासिर ने 14 साल जेल में बिताए,जब तक वह रिहा हुए उनका सब कुछ उजड़ चुका था दुनिया बदल चुकी थी और वह पुराने का वक़्त को ढूंढ रहे थे जिसको कोई नही लौटा पाया।

श्रीनगर के युवा मक़बूल शाह ने भी दिल्ली की तिहाड़ जेल में 14 साल बिताने पड़े, मक़बूल को 1996 के लाजपत नगर धमाके में पुलिस ने पकड़ा,उसके ख़िलाफ़ सबूत ने होने के कारण 2010 में दिल्ली हाइकोर्ट ने 14 साल बाद उसे बरी किया,जब वह रिहा हुए तो उनकी माँ इंतेज़ार में मर चुकी थी।

रामपुर के जावेद (35) को देशद्रोह के आरोप में 11 साल जेल में बिताने पड़े क्योंकि उसको पाकिस्तान की मोबीना से प्यार हुआ तो दोनों एक दूसरे के लिए ख़त लिखते थे,दोनों ने नाम के पहले अक्षर को कोड बना रखा था यूपी एसटीएफ ने J और M बनाकर जावेद को आतं’की बताया,अदालत ने 11 साल बाद बरी किया।

कानपुर के वासिफ़ हैदर को आतं’कवाद के आरोप में 9 साल जेल में बिताने पड़े,काम से घर लौटे वासिफ़ को दिल्ली पुलिस की स्पेशल सेल ने उठाया और तीन दिन तक यातनाएं देकर खूंखार आतंकी बता देशद्रोह और दंगे के आरोप में जेल भेज दिया,9 साल बाद अदालत से वासिफ़ बरी हुए।

पिलखुआ (हापुड़) के अब्दुल करीम उर्फ़ टूटा को एजेंसियों ने 2013 में खूंखार आतं’की बता कई अलग अलग धमाकों की प्लानिंग के मामलों में गिरफ्तार किया,2020 में 7 साल बाद अदालत ने उन्हें 1 मामले में तो बरी कर दिया लेकिन अन्य मामलों में गाज़ियाबाद की जेल में बंदी है।

श्रीनगर के मजीद भट्ट को 6 साल जेल में बिताने पड़े क्योंकि उनकी मेजर शर्मा से अनबन हुई थी जिसके बाद दिल्ली पुलिस ने उन्हें श्रीनगर से गिरफ्तार कर दिल्ली के पहाड़गंज से गिरफ्तारी दिखाई,RTI के द्वारा खुलासा हुआ तो अदालत ने मजीद को 6 साल बाद बरी कर दिया।

ऐसे बेगुनाह युवक जब अपने घर पहुंचते हैं तो उनकी दुनिया उजड़ चुकी होती है समाज उन्हें शक की निगाह से देखता है,जबकि वही पुलिस वाले कभी बहादुरी तो कभी पदोन्नति का मेडल अपने सीने पर लगाए फूले नही समाते है,लेकिन उन बेगुनाहों की जेल की सलाखों के पीछे गुजरी जिंदगी कोई नहीं लौटा सकता।

जब कोई वारदात होती है तो पुलिस पर दबाव होता है और उस दबाव को कम करने के लिए वह गर्दन के नाप का फंदा तलाशती है,उसे इस तरह पेश किया जाता है कि मुलजिम को मुजरिम पेश किया जाता है इतना ही नहीं बार काउंसिलें प्रस्ताव पारित कर केस लड़ने से इंकार कर देती है सामाजिक बहिष्कार हो जाता है।

कई बार आरोपियों का केस लड़ने वाले वकीलों को धमकी मिलती है मुंबई के वकील शहीद शाहिद आज़मी की ह’त्या इसकी मिसाल है,दिल्ली में आतंक के फर्जी मामले में 7 साल जेल में काट चुके शाहिद ने बेगुनाहों की पैरवी का प्रण किया था जिसके लिए उनकी भी ह’त्या कर दी गई।

दास्तां बेगुनाह पे आतंकी टैग की ज़ाकिर अली त्यागी के कलम से।

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